Vachanamrut Titles
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274 titles
गढ़डा प्रथम (७८)
- १. भगवान के स्वरूप में मन की अखंड वृत्ति
- २. तीन प्रकार के वैराग्य
- ३. लीलाचरित्र-स्मरण
- ४. नारदजी जैसी ईर्ष्या
- ५. ध्यान का आग्रह
- ६. विवेकी-अविवेकी
- ७. अन्वय-व्यतिरेक
- ८. भगवान एवं सन्त की सेवा
- ९. भगवान के प्रत्यक्षरूप की ही इच्छा
- १०. कृतघ्नी सेवकराम
- ११. वासना तथा एकान्तिक भक्त
- १२. तत्त्वों के लक्षण तथा उनकी उत्पत्ति
- १३. बड-पीपल की शाखा का रोपण
- १४. अन्ते या मतिः सा गतिः
- १५. ध्यान करने में कायर नहीं बनना
- १६. विवेकशीलता
- १७. सत्संग में कुसंग क्या है?
- १८. पंचविषयों का खण्डन, हवेली का दृष्टांत
- १९. आत्मनिष्ठा आदि गुणों की अपेक्षा
- २०. अज्ञानियों में अतिशय अज्ञानी कौन?
- २१. एकान्तिक धर्म, अक्षर के दो स्वरूप
- २२. भगवत्स्मरण के बिना प्रत्येक साधना शून्य
- २३. ब्रह्म-स्थिति को पाना; पानी का घड़ा ढालने के बजाए उंगली सी जलधारा बहाए रखना
- २४. ज्ञान की स्थिति; माहात्म्य की खटाई
- २५. बीस मोट का प्रवाह; चित्तवृत्ति का निरोध
- २६. रसिक भक्त; निर्गुणभाव
- २७. भगवान निरंतर निवास करके रहे ऐसी समझ
- २८. अर्धदग्ध काष्ठ; साधना में उत्थान-पतन
- २९. धर्मादि बल की वृद्धि का उपाय; प्रारब्ध, कृपा एवं पुरुष प्रयत्न
- ३०. संकल्पों के घाव से निवृत्त होने का उपाय
- ३१. निश्चय द्वारा महत्ता
- ३२. घोंसले और खूंटे के दृष्टांत से भगवान के स्वरूप में विराम
- ३३. मूढ़ विश्वास, प्रीति और ज्ञान से भगवान का दृढ़ आश्रय
- ३४. स्नेहरूपी माया - आज्ञापालन में सुख
- ३५. आत्मकल्याण के लिए यत्न
- ३६. सच्चा त्यागी
- ३७. जन्मभूमि की वासना; संत की पदवी
- ३८. सत्संग का मूल्यांकन; आत्मनिरीक्षण
- ३९. सविकल्प तथा निर्विकल्प स्थिति
- ४०. सविकल्प-निर्विकल्प समाधि
- ४१. एकोऽहं बहु स्यां प्रजायेय
- ४२. विधिनिषेध
- ४३. चार प्रकार की मुक्ति
- ४४. परमेश्वर में दृढ़ प्रीति तथा देहरूप अंगरखा
- ४५. साकार और निराकार का रहस्य
- ४६. आकाश की उत्पत्ति एवं विलय
- ४७. चार प्रकार की निष्ठा
- ४८. चार प्रकार के कुसंगी
- ४९. अन्तर्दृष्टि
- ५०. कुशाग्रबुद्धि
- ५१. हीरे से हीरे का छेद, भगवान से भगवान का निश्चय
- ५२. चार शास्त्रों से भगवान को समझना
- ५३. उन्नति और अवनति
- ५४. भागवतधर्म का पोषण और मोक्ष का द्वार
- ५५. भजन-स्मरण तथा व्रत-नियम की दृढ़ता
- ५६. निर्मानी भक्त की महत्ता; इष्टदेव की निष्ठा
- ५७. मोक्ष के असाधारण कारण
- ५८. देह, कुसंग और पूर्व संस्कार
- ५९. असाधारण स्नेह
- ६०. वासना को मिटाने की साधना
- ६१. राजा बलि की अनन्य भक्ति
- ६२. कल्याणकारी गुण
- ६३. भगवान का तत्त्वतः निश्चय
- ६४. शरीर और शरीरी
- ६५. ज्ञान, क्रिया एवं इच्छाशक्ति
- ६६. चतुर्व्यूह की वार्ता
- ६७. सत्पुरुष के गुण प्राप्त होने के उपाय
- ६८. आठ प्रकार की मूर्ति तथा सन्त में प्राकट्य
- ६९. अहिंसामय धर्म
- ७०. सत्संग-महिमा तथा भगवन्निश्चय की अडिगता
- ७१. भगवान अक्षरधाम सहित पृथ्वी पर बिराजमान हैं
- ७२. माहात्म्ययुक्त निश्चय
- ७३. काम पर विजय
- ७४. भगवान की इच्छा ही सर्वोपरि
- ७५. भक्त के सम्बंध से कल्याण
- ७६. क्रोधी, ईष्यालु, कपटी एवं मानी व्यक्ति
- ७७. ज्ञान की आड़ लेकर धर्म को झूठा मत करें
- ७८. देशकाल आदि की प्रधानता
सारंगपुर (१८)
- १. मन को जीतने का उपाय
- २. भगवान की मूर्ति में स्नेह
- ३. श्रवण, मनन, निदिध्यास और साक्षात्कार
- ४. आत्मा-अनात्मा का विवेक
- ५. वासना निवृत्ति; अन्वय-व्यतिरेक
- ६. प्रत्येक अवस्था में निहित दो-दो अवस्थाओं और वाणी के प्रकार
- ७. नैमिषारण्य क्षेत्र
- ८. ईर्ष्या का स्वरूप
- ९. युग के धर्म की प्रवृत्ति; स्वधर्मरूपी स्थान
- १०. आत्मदृष्टि – बाह्यदृष्टि
- ११. पुरुषप्रयत्न
- १२. आत्मविचार
- १३. शास्त्र-वचनों में विश्वास; अविचल निश्चय
- १४. प्रमाद तथा मोह
- १५. मुग्धा, मध्या और प्रौढा गोपियाँ
- १६. श्रीनरनारायण ऋषि का तप
- १७. मुक्तों के प्रकार-भेद
- १८. खार भूमि
कारियाणी (१२)
- १. कीट-भँवरी का दृष्टांत; जीव में भगवत्स्वरूप का निश्चय
- २. शापित बुद्धि
- ३. बाह्य प्रकृति से मनुष्य को परखना कठिन
- ४. जीव तथा साक्षी का ज्ञातृत्व
- ५. अवतार-धारण का प्रयोजन
- ६. मत्सर समस्त विकारों का आधार
- ७. आत्यंतिक कल्याण
- ८. सगुण-निर्गुण स्वरूप
- ९. भक्तों से मलिन रिस
- १०. तप से भगवान की प्रसन्नता
- ११. प्रीति के लक्षण
- १२. इमली के चीयें का दृष्टांत; कारण शरीर का नाश
लोया (१८)
- १. क्रोध अत्यंत दुःखदायी और संपूर्ण सत्संग
- २. विश्वासी, ज्ञानी, शूरवीर और प्रीतिमान
- ३. माहात्म्यज्ञान सहित निश्चय
- ४. अनंतकोटि ब्रह्मांडों की उत्पत्ति
- ५. इन्द्रिय-अंतःकरण पर जीत
- ६. संग-शुद्धि
- ७. ऋते ज्ञनान्न मुक्तिः
- ८. इन्द्रियों की चंचलता मिटाने के उपाय
- ९. धर्मादि चार गुणों की उत्पत्ति
- १०. निर्विकारिता
- ११. सत्पुरुष तथा असत्पुरुष की समझ
- १२. छः प्रकार के निश्चय
- १३. अचल सिद्धान्त
- १४. श्रीहरि की रुचि
- १५. काँच की प्रतिमा एवं गाय के दृष्टांत से आत्मदर्शन
- १६. वासना का कुंठित और निर्मूल होना
- १७. स्तुति एवं निंदा
- १८. भगवत्स्वरूप का निश्चय
पंचाळा (७)
गढ़डा मध्य (६७)
- १. मोह का स्वरूप
- २. विषयों की उत्पत्ति तथा उनकी निवृत्ति का उपाय
- ३. रसिक भक्ति एवं आत्मज्ञान
- ४. भगवान का अखंड चिन्तन
- ५. पतिव्रता का धर्म
- ६. हुंडी; चित्त का स्वभाव
- ७. दरिद्र के दृष्टांत से विकारों का उन्मूलन
- ८. एकादशी व्रत, ज्ञानयज्ञ, अंतर्दृष्टि
- ९. स्वरूपनिष्ठा, भगवत्स्वरूप का द्रोह
- १०. निश्चयरूप गर्भ का जतन
- ११. सभी कर्म भक्तिरूप कैसे हों?
- १२. आध्यात्मिक मार्ग की राजनीति
- १३. श्रीहरि के स्वरूप का ज्ञान; यथार्थ निश्चय
- १४. निर्विकल्प समाधि
- १५. स्वभाव पर शत्रुभाव
- १६. स्वरूपनिष्ठा एवं धर्मनिष्ठा
- १७. भगवत्स्वरूप में तत्त्व मीमांसा; स्थितप्रज्ञ
- १८. नास्तिक तथा शुष्क वेदान्ती
- १९. शुष्क वेदांत के ग्रंथ के श्रवण से उदासीन होकर किया गया पत्रलेखन
- २०. समाधिनिष्ठ की ज्ञानशक्ति
- २१. मोक्ष का रहस्य; प्रत्यक्ष भगवान और सन्त ही कल्याणकर्ता
- २२. शूरवीरता और अंतर्दृष्टि
- २३. विषयासक्ति की लू तथा शीत
- २४. सांख्यनिष्ठा एवं योगनिष्ठा
- २५. वासनिक त्यागी, और निर्वासनिक गृहस्थ
- २६. आत्मज्ञानादि गुणों से अधिक भक्ति का प्राधान्य
- २७. बड़े सन्त की प्रसन्नता का कारण मलिन वासना का त्याग
- २८. जीवन-डोर और दयालुता
- २९. भगवान में दृढ़ आसक्ति
- ३०. स्वर्ण तथा स्त्री बन्धनकारी
- ३१. मनन द्वारा ब्रह्म का संग
- ३२. कुटुम्बीजनों का सम्बंध
- ३३. निष्काम व्रत
- ३४. चौबीस तत्त्व जड या चैतन्य?
- ३५. भगवान के चरित्रों का गान
- ३६. अखंड वृत्ति के चार उपाय
- ३७. स्वाभाविक प्रकृति
- ३८. मांचा भक्त की समझ
- ३९. श्रीहरि के स्वाभाविक गुण
- ४०. एक दंडवत् प्रणाम अधिक
- ४१. अहंकार-रहित सेवा
- ४२. अक्षरधाम; मोक्ष की कुंजी
- ४३. ब्रह्मस्वरूपिणी प्रीति
- ४४. दैवी-आसुरी जीव
- ४५. एकावन प्रकार के मायिक बन्धनों से रहित होना
- ४६. मृत्युडौर; एकान्तिक धर्म से पतन
- ४७. पंचविषयों में आसक्ति
- ४८. अखण्ड भगवान का चिंतन
- ४९. भगवान और मायिक आकार में भिन्नता
- ५०. रहस्य; जगत वासना से मुक्ति
- ५१. आत्मसत्तारूप रहने के लक्षण
- ५२. त्यागी और गृहस्थ
- ५३. अपना दोष नहीं दीख पाना ही मोह
- ५४. सत्संग की महिमा; सत्पुरुष में आत्मबुद्धि
- ५५. स्वर्णरूप चैतन्य में चांदीरूप मायिक गुणों की मिलावट
- ५६. कुसुंभी वस्त्र के दृष्टांत से विषयासक्ति का त्याग
- ५७. आत्मनिष्ठा का प्रयोजन और सच्चा त्याग
- ५८. सम्प्रदाय की पुष्टि
- ५९. परम कल्याण
- ६०. विक्षेप मिटाना तथा पक्ष रखना
- ६१. पक्का सत्संगी
- ६२. आत्मनिष्ठा, पतिव्रता-भक्ति एवं दासत्व
- ६३. आत्मा को बलवान करने का उपाय
- ६४. भगवान के स्वरूप की महिमा
- ६५. भक्तिरहित ब्रह्मज्ञान निरर्थक
- ६६. सद्गुरुओं के प्रश्न
- ६७. स्वामी-सेवकभाव
वरताल (२०)
- १. निर्विकल्प समाधि
- २. पाँच शास्त्रों द्वारा भगवत्स्वरूप का ज्ञान
- ३. सत्पुरुष के चार प्रकार
- ४. वैचारिक भंवर
- ५. भगवान में माया न समझना; भक्त-भगवान की समान सेवा
- ६. जीव एवं कारण शरीर का नित्य सम्बंध
- ७. दैवी-आसुरी जीव के लक्षण
- ८. योगी की निद्रा
- ९. समाधिजन्य आनन्द
- १०. जीव के कल्याण का उपाय
- ११. जीव का विनाश; सत्पुरुष में आत्मबुद्धि ही आत्मदर्शन का साधन
- १२. माहात्म्य सहित निश्चय
- १३. ब्रह्म मूर्तिमान होते हुए भी व्यापक
- १४. धर्मिष्ठ तथा पापिष्ठ को समझने का विवेक
- १५. सत्पुरुष के अनुग्रह से आसुरी जीव दैवी होता है
- १६. बड़े आदमी के साथ रास नहीं आता
- १७. जितेन्द्रिय-भाव
- १८. सम्प्रदाय की रीति
- १९. भक्त की व्याख्या और अविवेक
- २०. जनकजी का ज्ञान
अमदावाद (३)
गढ़डा अंत्य (३९)
- १. ज्ञान तथा स्नेह का अंग
- २. सर्वार्थसिद्धि; प्रकट गुरुरूप हरि
- ३. दया एवं स्नेह
- ४. बाधितानुवृत्ति
- ५. माहात्म्ययुक्त भक्ति
- ६. जीव तथा मन की मैत्री
- ७. वज्र की कील
- ८. सदैव सुखी रहने के उपाय
- ९. अंतःजागृति का द्वार
- १०. पाँच अनादि तत्त्व
- ११. सीताजी की समझ
- १२. करामात!
- १३. विपरीत देशकाल में एकान्तिक धर्म की रक्षा
- १४. लम्बकर्ण बनने की अविवेकी याचना
- १५. भक्ति की रीति, जो मन को रास आती है।
- १६. पतिव्रता स्त्री के समान भगवन्निष्ठा
- १७. भरतजी का चमत्कारी आख्यान
- १८. वासना की जीर्णता
- १९. त्यागियों के दो कुलक्षण
- २०. स्वभाव, प्रकृति या वासना की परिभाषा
- २१. धर्म में भक्ति के समान गौरव
- २२. सखी-सखा भाव
- २३. मानसी पूजाविधि
- २४. सोलह साधन
- २५. भगवान की प्रसन्नता, सच्चे भक्त के लक्षण
- २६. मन-इन्द्रियों को वशवर्ती रखनेवाले संत
- २७. उचित-अनुचित गाँठ बाँधन से सुख-दुःखानुभूति
- २८. भगवन्नमार्ग से पतन होने के दो प्रकार
- २९. बीस वर्षीय दो हरिभक्त
- ३०. पाँच बातों का नित्य स्मरण
- ३१. छाया के दृष्टांत से ध्यान
- ३२. माहात्म्य की आड़ में पाप
- ३३. बुद्धिभेद न होने के चार उपाय
- ३४. भगवान के प्रति वासना के उपाय
- ३५. भक्त के द्रोह से भगवान का द्रोह
- ३६. कल्याण का असाधारण साधन
- ३७. दरिद्रता में पूर्व सुखानुभूति का स्मरण
- ३८. सांख्य तथा निरंतर सुख!
- ३९. आत्मा-परमात्मा का चिंतनसातत्य
भूगोल-खगोल वचनामृतम्
अधिक वचनामृत (११)
- १. अहमदावाद ४: भगवान के स्वरूप का दृढ़ निश्चय
- २. अहमदावाद ५: श्री पुरुषोत्तम भगवान का असाधारण लक्षण
- ३. अहमदावाद ६: भगवान का माहात्म्य जानने से अडिग निश्चय
- ४. अहमदावाद ७: भगवान का माहात्म्य जानने से मन की स्थिरता
- ५. अहमदावाद ८: क्रोध उत्पन्न होने के कारण और उसे जीतने का उपाय
- ६. असलाली: भगवान का स्वरूप जानने में न्यूनता रहने से रह जाता बड़ा दोष
- ७. जेतलपुर १: माया से मुक्त होने का उपाय और संत के प्रति आत्मबुद्धि
- ८. जेतलपुर २: यति के लक्षण और जीव का स्वरूप
- ९. जेतलपुर ३: दुष्ट वासना को टालने का उपाय
- १०. जेतलपुर ४: प्रत्यक्ष भगवान के निश्चय द्वारा जीव का कल्याण
- ११. जेतलपुर ५: भगवान को भजना इसके उपरान्त अन्य कोई बात बड़ी नहीं
